Wednesday, 13 December 2017

पंचतंत्र की कहानी - व्यापारी का पतन और उदय


वर्धमान नामक शहर में एक बहुत ही कुशल व्यापारी रहता था। राजा को उसकी क्षमताओं के बारे में पता था जिसके चलते राजा ने उसे राज्य का प्रशासक बना दिया। अपने कुशल तरीकों से व्यापारी ने राजा और आम आदमी को बहुत खुश रखा। कुछ समय के बाद व्यापारी ने अपनी लड़की का विवाह तय किया। इस उपलक्ष्य में उसने एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। इस भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा तक सभी को आमंत्रित किया। राजघराने का एक सेवक, जो महल में झाड़ू लगाता था, वह भी इस भोज में शामिल हुआ। मगर गलती से वह एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो केवल राज परिवार के लिए रखी हुयी थी। सेवक को उस कुर्सी पर बैठा देखकर व्यापारी को गुस्सा आ जाता है और वह सेवक को दुत्कार कर वह वहाँ से भगा देता है। सेवक को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है और वह व्यापारी को सबक सिखाने का प्रण लेता है।

अगले ही दिन सेवक राजा के कक्ष में झाड़ू लगा रहा होता है। वह राजा को अर्धनिद्रा में देख कर बड़बड़ाना शुरू करता है। वह बोलता है, “इस व्यापारी की इतनी मजाल की वह रानी के साथ दुर्व्यवहार करे। ” यह सुन कर राजा की नींद खुल जाती है और वह सेवक से पूछता है, "क्या यह वाकई में सच है? क्या तुमने व्यापारी को दुर्व्यवहार करते देखा है?" सेवक तुरंत राजा के चरण पकड़ता है और बोलता है, "मुझे माफ़ कर दीजिये, मैं कल रात को सो नहीं पाया। मेरी नींद पूरी नहीं होने के कारण कुछ भी बड़बड़ा रहा था।" यह सुनकर राजा सेवक को कुछ नहीं बोलता लेकिन उसके मन में शक पैदा हो जाता है।

उसी दिन से राजा व्यापारी के महल में निरंकुश घूमने पर पाबंदी लगा देता है और उसके अधिकार कम कर देता है। अगले दिन जब व्यापारी महल में आता है तो उसे संतरिया रोक देते हैं। यह देख कर व्यापारी बहुत आश्चर्य -चकित होता है। तभी वहीँ पर खड़ा हुआ सेवक मज़े लेते हुए बोलता है, "अरे संतरियों, जानते नहीं ये कौन हैं? ये बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो तुम्हें बाहर भी फिंकवा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसा इन्होने मेरे साथ अपने भोज में किया था। तनिक सावधान रहना।"

यह सुनते ही व्यापारी को सारा माजरा समझ में आ जाता है। वह सेवक से माफ़ी मांगता है और सेवक को अपने घर खाने पर बुलाता है। व्यापारी सेवक की खूब आव-भगत करता है। फिर वह बड़ी विनम्रता से भोज वाले दिन किये गए अपमान के लिए क्षमा मांगता है और बोलता है की उसने जो भी किया, गलत किया। सेवक बहुत खुश होता है और व्यापारी से बोलता है, "आप चिंता ना करें, मैं राजा से आपका खोया हुआ सम्मान आपको ज़रूर वापस दिलाउंगा।"

अगले दिन राजा के कक्ष में झाड़ू लगाते हुआ सेवक फिर से बड़बड़ाने लगता है, “हे भगवान, हमारा राजा तो इतना मूर्ख है कि वह गुसलखाने में खीरे खाता है।"  यह सुनकर राजा क्रोधित हो जाता है और बोलता है, “मूर्ख, तुम्हारी ये हिम्मत? तुम अगर मेरे कक्ष के सेवक ना होते, तो तुम्हें नौकरी से निकाल देता।" सेवक फिर राजा के चरणों में गिर जाता है और दुबारा कभी ना बड़बड़ाने की कसम खाता है।

राजा भी सोचता है कि जब यह मेरे बारे में इतनी गलत बातें बोल सकता है तो इसने व्यापारी के बारे में भी गलत बोला होगा। राजा सोचता है की उसने बेकार में व्यापारी को दंड दिया। अगले ही दिन राजा व्यापारी को महल में उसकी खोयी प्रतिष्ठा वापस दिला देता है।

सारांश: व्यक्ति बड़ा हो या छोटा, हमें हर किसी के साथ समान भाव से ही पेश आना चाहिए। 

Click=>>>>>Hindi Cartoon for more Panchatantra Stories........ 

Wednesday, 6 December 2017

पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख बुनकर


बहुत पुरानी बात है, किसी नगर में एक जुलाहा रहता था। वह दिन-रात कपड़े बुनकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। एक दिन जब वह कपड़े बुन रहा था, तभी उसके सभी उपकरण टूट गए। उन उपकरणों की मरम्मत के लिए उसे नयी लकड़ियों की आवश्यकता थी। वह लकड़ियाँ लेने जंगल में गया और एक वृक्ष को देखकर रुक गया। उस वृक्ष की लकड़ियाँ उपकरणों के लिये बिलकुल उपयुक्त थी। जैसे ही उसने लकड़ियाँ काटने के लिए अपनी कुल्हाड़ी उठायी, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी। 

उस आवाज़ को सुनकर वह रुक गया। परन्तु दूर-दूर तक उसे कोई नजर नहीं आया। जब वह पुनः लकड़ी काटने के लिए तत्पर हुआ, तभी वृक्ष से एक देव प्रकट हुए और जुलाहे से कहा - “मैं इस वृक्ष का देव हूँ। मैं सालों से इस वृक्ष पर आराम करता आया हूँ। तुम इसे क्यों काटना चाहते हो?" यह सुनकर जुलाहे ने जवाब दिया - “हे देव ! मैं एक जुलाहा हूँ और मेरे उपकरणों की मरम्मत के लिए इस वृक्ष कि लकड़ियाँ बिलकुल उपयुक्त है।"

यह सुनकर देव कहते हैं - “इस वृक्ष को मत काटो। तुम जो चाहो वरदान माँग सकते हो” वरदान की बात सुनकर वह अपनी पत्नी के साथ विचार-विमर्श करने के लिए देव से एक दिन का समय मांगता है देव से एक दिन का समय लेकर जुलाहा वापस अपने नगर आ जाता है। वह अपनी पत्नी को सारे घटनाक्रम को विस्तार से बताकर पूछता है कि उसे वरदान में क्या माँगना चाहिये?

उसकी पत्नी कहती है कि उसे दो हाथ और और दो सर माँग लेने चाहिये। जितने ज्यादा हाथ रहेंगे तुम उतने ज्यादा कपड़े बुन सकोगे। अगले दिन वह देव से दो हाथ और दो सर माँगता है। देव उसे दो हाथ और दो सर का वरदान देकर अन्तरध्यान हो जाते हैं। दो सर और चार हाथ हो जाने पर वह बहुत खुश होता है और अपने नगर की ओर चल देता है। नगरवासी जब उसे देखते है तो डर जाते है और उसे दो सर और चार हाथ वाला राक्षस समझकर उसकी खूब पिटायी करते हैं। 



सारांश - हमें कोई भी निर्णय लेने से पूर्व अच्छे से विचार कर लेना चाहिये।

Click=>>>>>Hindi Cartoon for more Panchatantra Stories........ 

Wednesday, 29 November 2017

पंचतंत्र की कहानी - शेर और गीदड़



एक शेर और शेरनी अपने दो शावकों के साथ वन में रहते थे। दोनों में बहुत प्रेम था। शेर, शेरनी के लिए शिकार लेकर आता था और वह मिल-बाँट कर खा लेते  थे। एक दिन शेर को जंगल में शिकार के लिए कुछ भी नहीं मिला। जब वह वापिस अपने घर की ओर आ रहा था तो उसे गीदड़ का एक बच्चा नजर आया। इतने छोटे बच्चे को देखकर शेर को दया आ गई। उसे मारने के बजाए वह उसे अपने दांतो से पकड़कर गुफा में ले आया। गीदड़ के बच्चे को देखकर शेरनी को भी दया आ गई और वह अपने दोनों बच्चो के साथ उसे भी पालने लगी। 

तीनों बच्चे साथ खेलते-कूदते बड़े होने लगे। शेर के बच्चों को ये नहीं पता था की उनका तीसरा भाई एक गीदड़ है, शेर नहीं। एक दिन जब तीनों जंगल में घूम रहे थे, तो उन्हें हाथियों का एक झुण्ड नजर आया। हाथियों को देखकर गीदड़ ने अपने शेर भाइयों से कहा, “ये हाथी हमसे बहुत ही ताक़तवर हैं। हमें इनसे नहीं लड़ना चाहिए।” गीदड़ की ये बातें सुनकर उसके दोनों भाई जोर-जोर से हँसने लगे। गीदड़ को बहुत गुस्सा आया लेकिन वह कुछ नहीं कह पाया। घर आते समय, उसके दोनों भाई उसका रास्ते भर मजाक उड़ाते रहे। 

घर आकर गीदड़ ने सारी बात शेरनी को बताई, “माँ, आप इन्हें समझा लो। ये पुरे रास्ते भर मेरा मजाक उड़ाते आए हैं। अगर मुझे गुस्सा आ गया तो मैं इन्हें मार भी सकता हूँ।” गीदड़ की बात सुनकर शेरनी के दोनों बच्चों ने उसे हाथी से डरकर भागने की बात बताई और कहा की गीदड़ ना खुद आगे गया और ना उन्हें जाने दिया। ये सब बातें सुनकर शेरनी ने गीदड़ को समझाया, “बेटा, ये तुम्हारे छोटे भाई हैं। इन्हें माफ करना ही तुम्हारा फ़र्ज़ है। तुम इनसे बड़े हो और बड़ो का फर्ज छोटों को माफ़ करना होता है, तभी तो वो तुम्हें इज्ज़त देंगे।"

शेरनी की बातें सुनकर भी गीदड़ को तसल्ली नहीं होती और वो फिर भी उसके बच्चों पर गुस्सा निकालता है। ये सब देखकर शेरनी को भी गुस्सा आ जाता है। तब शेरनी, गीदड़ को फिर से समझाती है – “तुम्हे सच्चाई का पता नहीं है कि तुम कौन हो और वो कौन हैं। तुम एक गीदड़ के कुल से हो और तुम्हारे उस कुल में हाथी को देखकर सब डर जाते हैं। तुमने वैसे ही किया हैं जैसा कि तुम्हारे कुल में किया जाता है। हमने तुम पर दया करके तुमको अपने बच्चे की तरह पाला। इसके पहले की तुम्हारी हकीकत उन दोनों को पता चले और वह तुम्हे मार डालें, तुम अपने कुल के सदस्यों के पास भाग जाओ।" यह सुनते ही गीदड़ वहाँ से भाग जाता है। 


सारांश - हमारी पहचान कभी भी बदली नहीं जा सकती। 


                 Click=>>>>>Hindi Cartoon for more Panchatantra Stories........